तकल्लुफ ना कीजिए उन्हें भुलाने की , रहने भी दीजिए दिल में कुछ यादें उनके फसाने की । आहिस्ता आहिस्ता सुलगती रहेगी जिंदगी यादों में उनकी ज़रूरत ही क्या है मिटा कर यादों को इक ही दिन मर जाने की ।
दिल में जज्बातों के तमाम सैलाब उमड़े हैं मगर कमबख़्त बताएं भी तो किसको ! हमे अपनों ने हीं तो लाया है इस मुकाम पर अब अपनों से रूठ कर अपना बनाए भी तो किसको !