*"ख्वाहिश*
प्यार हो गया उनसे, मगर खता नहीं कि बताने की,
दर्द बढ़ता गया, सजा थी ना दूर रह पाने की,
कुछ दिन दूर होकर उनसे करा ही दी मोहब्बत से रूबरू उनको
आज तो ख्वाहिश है बस एक दूसरे की बाहों में रहने की!!
कहां था मैंने उससे तकलीफ होगी बहुत बाद जुदाई की,
जवाब था उनका अभी तो जी ले क्या पता कल सांसो की रुसवाई की,
तुम साथ हो तो सह लेंगे हर सितम किस्मत की,
आज तो ख्वाहिश है बस एक दूसरे की बाहों में रहने की!!
वक्त गुजरता गया प्यार बढ़ता गया।
वो पास आती गई और ना मैं दूर जाता गया।
फासले कुछ यू कम हुए जैसे फूल बहारों सा हुआ।
अब तो होने लगी थी रुसवाई जमाने की,
मगर फिर भी ना कम हुई नज़दीकियां डर से हुक्मरानों की।
आज तो ख्वाहिश है बस एक दूसरे की बाहों में रहने की।।

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