कैसे तुझे बना लूं रहबर ख़ुद से?
वक्त का तकाजा यही है, कि अभी हम ना मिले । नहीं तो रुसवाईयां, हुज्जते, दर्दो गम बहुत कुछ मिलेंगे जमाने से! नहीं चाहते हम ये खामोशियां, तन्हाईयां, बद्दुआएं हुक्मरानों से! ख्वाहिश है उनकी भी शहज़ादियों सा विदा करें मुझे अपने आंगन से! यूं ही कैसे रहबर बना लूं मैं तुझे खुद से.......... ढूंढ रही है मां मेरी किसी शहजादे को मेरे लिए, अभी तक नजर आया नहीं, कोई काबिल उसे अगर तू आफताब बन सके तो तुझ में कुछ बात हो ...